राजीव गांधी – कम्प्यूटर क्रांति के सूत्रधार
आज ही के दिन 20 अगस्त 1944 राजीव गांधी जन्म मुम्बई में हुआ था संजय गांधी के प्लेन हादसे से हुई मृत्यु के कारण बहुत हिचक के साथ राजनीति में कदम रखा। अमेठी सीट से उपचुनाव जीत कर सांसद बने। इंदिराजी की हत्या के बाद 1984 में प्रधानमंत्री बने, महज 40 साल की उम्र में, भारत के आजतक के सबसे युवा प्रधानमंत्री बने थे
ताजपोशी के बाद सबसे पहले सिख विरोधी दंगे नियंत्रित किये थे
उसी वर्ष लोकसभा चुनाव हुआ था जिसमें चार सौ से ऊपर सीटें जीतीं। लेकिन इसमें उनका योगदान के साथ साथ इंदिरा जी की हत्या के कारण उपजी सहानुभूति भी थी। आने वाले साल राजीव के लिए बहुत कठिन रहे। शाहबानो को लेकर अल्पवर्ग के प्रति सहानुभूति के कारण बहुसंख्यक के साथ साथ अल्पसंख्यक भी नाराज़ हो गए।
श्रीलंका में तमिल मिलिटेंसी को कुचलने के लिए भेजी गयी ‘पीस कीपिंग’ फौज, पंजाब समस्या सुलझाने के लिये राजीव गाँधी-लोंगोवाल एकॉर्ड, मिजोरम समझौता आदि कई अच्छे काम किये। लोकप्रियता के नए आयाम छुए।
इधर सच्ची बात कह कर ब्यूरोक्रेसी को नाराज़ कर डाला उन्हों ने कहा था कि गरीब के लिए भेजे गए हर एक रूपए में उसको सिर्फ 15 पैसे ही मिलते हैं।
अभिमन्यु चक्रव्यूह में फँस गया। लेकिन राजीव गांधी ने इन आँधियों के बीच अपने अकेले दम पर कुछ बहुत अच्छे काम भी किये जिसके लिए राष्ट्र उन्हें आज भी सलाम करता है। सबसे पहले उन्होंने आया-राम गया राम पर अंकुश लगाने के लिए ‘एंटी डिफेक्शन बिल’ पास कराया।
सबसे महत्वपूर्ण तो इक्कीसवीं शताब्दी में छलांग लगाने की बात की। सूचना तंत्र की क्रांति का बिगुल बजाया। गांव गांव में पीसीओ लग गए। कंप्यूटर की शुरुआत की। इसके लिए उनके बहुत विरोधी हो गये थे लोग कहते थे कंप्यूटर के आजाने से बेरोजगारी बढ़ेगी। लेकिन नतीजा देखिये कि कंप्यूटर आज सबसे अच्छा मित्र है आज हर हाथ मे कप्यूटर होगया।
उन्होने ही मालद्वीप में सेना भेज कर विद्रोह को कुचला। जिनको हमला करके 21 मई 1991 में मात्र 46 वर्ष के आयु में शहीद कर दिये गये
1989 के चुनाव में बोफोर्स में भ्रष्टाचार के घने गहरे छाये थे। मीडिया पूरी तरह से राजीव गांधी के विरोधी थी

उस समय ऐसा लगता था कि कांग्रेस का नामो-निशान मिट जाएगा। लेकिन इसके बावज़ूद राजीव गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस को लोकसभा में सर्वाधिक 196 सीटें मिलीं। उन्हें सरकार बनाने का ऑफर मिला। विरोधियों को मिर्ची लग गयी। लेकिन उन्होंने बड़ी शालीनता से विपक्ष में बैठना स्वीकार किया।
पहले वीपी सिंह और फिर चंद्रशेखर के नेतृत्व में बनीं सरकारें चल नहीं सकीं।तब जनता को राजीव गांधी शिद्दत से याद आये। और लगभग तय था कि राजीव गांधी 1991 के चुनाव में एक बार फिर से प्रधानमंत्री बनेंगे।
मगर इससे पूर्व ही श्रीलंका में के लिट्टों के प्रति नीति का विरोध करने वालों उनकी हत्या कर दी।
जिन लोगों ने राजीव को बहुत निकट से देखा और जाना है, उनका कथन है कि राजीव गांधी जैसा शालीन बंदा दूसरा नहीं देखा। वे नौजवानों को आगे लाना चाहते थे इसी लिए उन्होंने मत डालने की आयु 18 वर्ष की थी लेकिन आज भी राजू गाँधी देश के युवाओं के दिलों पर राज करते है
उन्होंने ही कहा था – मेरा भारत महान। अगर राजीव होते तो आज राजनीति का सीन कुछ और होता। काश वह घटना न होती तो देश की हालत कुछ और होती!

Shamsulhuda sh

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