शक की नज़रों से बहू को नहीं देखा जाता।

जब देश आज़ाद हुआ उस वक्त देश के हालात बहुत ज्यादा खराब थे, कपड़े नहीं थे, खाने के लिये अन्न नही था, अमेरिका से लाल गेंहू भारत आया करता था, फिर एक वक्त ऐसा आया कि देश में अकाल पड़ गया और अमेरिका से अनाज भारत आता था उसे भी भारत को देने से इनकार कर दिया, अमेरिका ने साफ साफ अल्फाज़ में कह दिया कि हम अपना अनाज समुन्द्र में बहा देंगे लेकिन भारत को नहीं देंगे। उस समय भारत युद्ध का सामना कर रहा था, तत्काली प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने नारा दिया ‘जय जवान, जय किसान’ यानी सीमा पर जवान और देश में किसान। दिलचस्प यह है कि खेत में जो किसान काम कर रहा था उसी का बेटा सीमा पर देश की रक्षा कर रहा था। एक तरह किसान के परिवार पर ही यह जिम्मेदारी थी कि वह देश भी रखाये और अन्न भी पैदा करे। हालात बदले, वक्त बदला, फिर वही देश जो अमेरिका से अनाज मंगाता था उसने तरक्की की, अनाज पैदा किया और इतना पैदा किया कि सरकार के पास उसके उगाये अनाज को रखने तक के लिये जगह नहीं है, आज भी सरकारी गौदामों में अनाज सड़ रहा है, सरकार के पास उसे ढ़कने के लिये तिरपाल तक नही है।

एक ‘चौकीदार’ कहता है कि 70 साल में कुछ नहीं हुआ, हैरानी इस बात की है कि जब वह कहत है कि 70 साल में कुछ भी नहीं हुआ तो जाहिलों की जमात उसी पर भरौसा कर लेती है कि वाकई 70 साल में कुछ नही हुआ। बीते रोज़ टीवी पर भाजपा प्रवक्ता हैं और वह भी यही रोना रो रहा हैं कि 70 सालों से वगैरा वगैरा…… फिर उन्होंने लौमड़ी जैसी मानसिकता का परिचय दिया और किसानों की बदहाली पर हो रही डिबेट को कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी पर ले आया। और सवाल पर सवाल करने लगा कि बताईये सोनिया गांधी कौन हैं ? क्या वे किसान हैं ? बताईये कौन हैं वो ? बताईये वे इटली में क्या करतीं थीं ? देश की जनता देख रही है कि कांग्रेसी ये नहीं बता रहे हैं कि सोनिया गांधी इटली में क्या करतीं थीं ? क्योंकि इनमें बताने की हिम्मत नहीं हैं कि सोनिया इटली में क्या काम करती थी ?

दरअस्ल भाजपा प्रवक्ता चीख चीख कर कहना चाह रहे थे कि सोनिया इटली में बार डांसर थी, हालांकि इस फिजूल की बात का सच्चाई से कोई वास्ता नहीं है, लेकिन भाजपाई तो गोयलेबस के चेले हैं इसलिये झूठ को चीख चीख कर बोलते हैं ताकि झूठ सच लगने लगे। खैर अगर यह मान भी लिया जाए कि सोनिया इटली में बार में काम करतीं थीं तो क्या बार में काम करना गुनाह है ? अगर गुनाह है तो फिर भारतीय संविधान ने उसे गुनाह क्यों नहीं माना ? क्यों हर एक मेट्रोपोलिटिन शहर में बार खुले हैं ? सो बातों की एक बात यह है कि सोनिया गांधी इटली में जो भी रहीं हों लेकिन वे इस देश के ऐसे परिवार की बहु हैं जिसने इस देश के लिये अपनी जान कुर्बान की हैं, वे किसी ऐसे परिवार का हिस्सा नहीं जिसने अंग्रेजों की गुलामी स्वीकार करके उनके लिये मुखबिरी की हो बल्कि वे उस परिवार की बहु हैं जो आज़ादी से पहले और आज़ादी के बाद इस देश के लिये कुर्बानी देता रहा है।

सोनिया उस शख्स की विधवा है जिसने इस देश को डिजिटल बनाने की नींव रखी, वह एक शहीद प्रधानमंत्री की विधवा है। क्या शहीदों की विधवाओं से या किसी भी विधवा से इसी तरह बात की जाती है ? क्या देश के लिये कुर्बानी देने वाले परिवारों की महिलाओं से ऐसा व्यवहार किया जाता है ? क्या बहु के साथ ऐसा ही व्यवहार किया जाता है ? क्या भाजपा प्रवक्ता के परिवार में बहु पर ऐसे ही लांछन लगाये जाते हैं ? बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ, महिलाओं का सम्मान ये सारे नारे उस वक्त खोखले नज़र आते हैं जब इन नारों को देने वाली पार्टी का प्रवक्ता एक महिला विशेष पर भद्दी टिप्पणियां करता है। आखिर इन्हें कौन बताये कि सोनिया कुछ भी होने से पहले इस देश की बहु है, इस देश की लाज है, और वह महिला है जिसने प्रधानमंत्री पद का भी त्याग कर दिया, लेकिन उसे क्या पता था कि उसी पद पर बने रहने के लिये एक व्यक्ती विशेष के पाले हुए ट्रोल उस पर भद्दे भद्दे लांछन लगायेंगे। मुनव्वर राना ने सोनिया के लिये जो कहा है क्या वह झूठ है ?
एक बेनाम सी चाहत के लिए आई थी
आप लोगों से मुहब्बत के लिए आई थी
मैं बड़े बूढ़ों की ख़िदमत के लिए आई थी
कौन कहता है हुकूमत के लिए आई थी
अब यह तक़दीर तो बदली भी नहीं जा सकती
मैं वह बेवा हूं जो इटली भी नहीं जा सकती
मैं दुल्हन बन के भी आई इसी दरवाज़े से
मेरी अर्थी भी उठेगी इसी दरवाज़े से

मैंने आखों को कही पर भी छलकने न दिया
चादर ए ग़म को ज़रा सा भी मसकने न दिया।
अपने बच्चों को भी हालात से थकने न दिया
सर से आंचल को किसी पल भी सरकने न दिया।
मुद्दतों हो गईं खुलकर कभी रोई भी नहीं
इक ज़माना हुआ मैं चैन से सोई भी नहीं।

लेकिन नफरत की आग में जलकर राख हुए जा रहे समाज को, वाटसप यूनीवर्सिटी से डिग्री लेकर निकल रहे ‘बुद्धीजीवी’ को, डिग्री फेंककर हाथो में त्रिशूल, और गले में भगवा गमछा डालकर घूम रहे ‘धर्म रक्षक’ को, और इन सबके गुरु जी मेंढ़क जैसी आंखों वाले को कौन बतायेगा कि –
शिजरा ओ रंग गुल ओ बू नहीं देखा जाता
शक की नज़रों से बहू को नहीं देखा जाता।

(यह लेख जाने माने लेखक वसीम अकरम त्यागी के फेसबुक वॉल से लिया गया है)

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