हापुड़: 04 अक्टूबर 2018 सुलेमान अहमद) अग्रेजों को भारत छोड़ने के लिए महात्मा गांधी ने जो अलख जगाई थी उसको लेकर जनपद में कई स्थानों पर आज भी गांधी जी की यादें संजोए हुए इमारतें खड़ी हुई हैं। लेकिन रियासत के स्वामी रहे परिवारों द्वारा अलग से मकान बनाने के साथ साथ अलग अलग शहरों में जाकर बसने आज वह इमारत खंडहर का रुप धारण करती जा रही है। जबकि गांधी जी ने 1942 में गढ़ के रेलवे स्टेशन के पास भी लोगों को जागरुक किया था।अंग्रेजी हुकुमत में असौड़ा रियासत के नाम से जाने वाले असौड़ा गांव का आजादी की लडा़ई में काफी योगदान रहा है।
महात्मा गांधी के लिए असहोयग आंदोलन की शुरुआत असौड़ा से शुरू हुई थी जो फंफूदा आदि गांवों से निकलते हुए मेरठ और गाजियाबाद पहुंची थी। लोनी में नमक के पैकेट बांटे गए थे। मेरठ में खादी की टोपी और खादी का प्रयोग करने के भाषण पर रघुवीर नारायण के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर जेल भेज दिया गया था। असौड़ा में जन्मे रघुवीर नारायण त्यागी के पिता के समय में चौधरी परगना की उपाधि प्राप्त थी। रघुवीर सिंह नारायण के पिता का नाम चौधरी देवी सिंह था। जो उत्तर प्रदेश में बड़े जमीदारों में गिने जाते थे। अंग्रेजी राज में उनको राय बहादुर की ख्याति मिली हुई थी। 1889 में चौधरी साहब के कुनबे के दादा दुर्गा सिंह ने मुम्बई, मद्रास आदि में कांग्रेस के अधिवेशन में भाग लिया था। 1910 में अंग्रेजी राज में उनको ऑनरेरी मजिस्ट्रेट नियुक्त कर दिया गया था। असहयोग आंदोलन में चौधरी साहब ने सक्रिय भूमिका निभाई थी। असौड़ा रियासत में महात्मा गांधी ने आकर अपना भाषण दिया था। महात्मा गांधी यहां आया जाया करते थे। 1928 में महात्मा गांधी असौड़ा में आए थे। जिन्होंने असौड़ा महल में बैठकर कांग्रेसियों के साथ मीटिंग की थी। रघुवीर नारायण त्यागी के वंशज अजय वंश नारायण त्यागी बताते है कि महात्मा गांधी ने संवज्ञिा आंदोलन से पहले असौड़ा महल में आकर मीटिंग की थी। जिसमें ग्रामीणों को अंग्रेजों को भारत से बाहर भेजने के लिए मंत्रणा हुई थी। लेकिन असौड़ा रियासत का वह महल आज जर्जर हालत में है क्योंकि वहां से निकलकर परिवार अलग अलग शहरोंं में आज जॉब कर रहे हैं तो कुछ सदस्य व्यापार तो कुछ सदस्य शहर के आसपास कोठी में रहकर खेती कर रहे हैं।

गढ़ तीर्थनगरी में भी बोले थे गांधी जी–1942 में महात्मा गांधी गढ़मुक्तेश्वर तीर्थनगरी पहुंचे थे। बताया गया है कि रेलवे स्टेशन के पास ही गांधी जी की सभा का आयोजन किया गया था। जिसमें महात्मा गांधी ने अंग्रेजों के खिलाफ बिगुल बजाया था।हापुड़ में आए महात्मा गांधी—जब देश गुलामी की जंजीरों में जकड़ा हुआ था और देश के युवा आजादी के लिए जंग कर रहे थे तो मेरठ की तहसील हापुड़ में आग सुलग रही थी। 1857 से लेकर 1947 तक हर चिंगारी हापुड़ से निकल रही थी। इसी क्रम में 1935 में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी हापुड़ के गांधी कालोनी में आए थे। महात्मा गांधी ने स्वतंत्रता सेनानियों की मीटिंग लेकर उनको आजादी का मंत्र दिया था। आशुतोष आजाद बताते है कि महात्मा गांधी जहां पर आए थे उस स्थान पर बसी कालोनी का नाम आज गांधी कालोनी के नाम से है।

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