पीड़ित को ही उसकी पीड़ा के लिए ज़िम्मेदार ठहराना शोषण करने की सबसे पुरानी पद्धति है। मुसलमानों के साथ बुद्धिजीवी समाज ने यही किया है, इनकी बदहाली का पूरा ज़िम्मेदार इनके अशिक्षित होने की वजह को बता दिया।
जबकि ये सबसे बड़ा झूठ है, मुसलमान इसलिए अशिक्षित नहीं हैं क्योंकि वे मुसलमान हैं बल्कि इसलिए अशिक्षित हैं क्योंकि इसके लिए सरकार और ये पूरा तंत्र ज़िम्मेदार है।

मुसलमानों में ही एक बहुत बड़ा तबक़ा ऐसा है जो ऐसी घरो में बैठकर ये बात कहते हुए मिल जाएगा कि हम लोग पढ़ाई लिखाई नहीं करते इसलिए हमलोग पीछे हैं, हमारी बदहाली का ज़िम्मेदार हम ख़ुद हैं। जबकि इस सूटेड बूटेड ज़ाहिल तबके को ये नहीं पता कि आरक्षण से पहले कौन सा पिछड़े एवं दलित हिंदू पढ़े लिखे एवं रोज़गार में पाए जाते थे? इनके सामाजिक एवं आर्थिक विकास में आरक्षण का योगदान को भूल क्यों जाते हैं?

अनुच्छेद 341, जिसने मुस्लिमों के शिक्षा एवं रोज़गार से सबसे अधिक नुक़सान पहुँचाया। यही नहीं राजनैतिक हिस्सेदारी तक से महरूम कर दिया। पर किसी भी धर्मनिरपेक्ष दल ने इसके ख़िलाफ़ आवाज़ नहीं उठाई। बल्कि ये तो ख़ुद कांग्रेस जैसी धर्मनिरपेक्ष दलों की मक्कारी का नतीजा है और सपा बसपा राजद कामनिस्ट से लेकर तमाम मुसलमानों के ठेकेदार दलों की इसपर मौन सहमति भी है।

यहाँ मैं कांग्रेस से अधिक दोषी उन अशराफ मुसलमानों को मानता हूँ जिनके हाथों में मुस्लिमों की लीडरशिप थी, उन उलेमाओं और धार्मिक संगठनों को भी बराबर का ज़िम्मेदार मानता हूँ क्योंकि इन सब पर ख़ुद मुस्लिम सवर्ण समाज का क़ब्ज़ा था इसलिए इन्हें अपना ख़ुदका कोई नुक़सान नहीं दिखा इसलिए बाक़ी के बहुसंख्यक मुसलमानों के साथ खुलकर ग़द्दारी की। धर्मनिरपेक्ष दलों में रहकर दलाली करते रहे पर कभी अपनी ही क़ौम के हुकूक़ पर डाले जा रहे इस डाके पर आवाज़ नहीं उठाई।
सच्चर की रिपोर्ट पढ़िए, इसमें साफ़ साफ़ मुसलमानों के पिछड़ेपन का एक कारण ये भी बताया गया है।

अफ़सोस, आज़ादी से आजतक हो रहे इतने बड़े सुनियोजित लूट पर किसी ने आवाज़ नहीं उठाई, बस आवाज़ उठाई तो ये कहा कि तुम लोग पढ़ते लिखते नहीं हो इसलिए पिछड़े हो।

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